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Thursday, June 17, 2010

तन्हाई भी एक आईना है

कई दिनों तक  वायरल बुखार का शिकार था। तन्हाई में था। तन्हाई भी एक  आईना है- हम ऐसी चीजें देख पाते हैं, जो भीड़भाड़ में नहीं दिखाई देतीं। सो, पाकिस्तानी कवयित्री परवीन शाकिर की  चार टुकड़ों में लिखी यह बहुत ही प्यारी कविता पढि़ए-
:: दोस्त चिडिय़ों के लिए ::
        परवीन शाकिर

एक
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भोली चिडिय़ा!
मेरे कमरे में क्या लेने आई है?
यहां तो सिर्फ किताबें हैं
जो तुझको तेरे घर का नक्शा तो दे सकती हैं
लेकिन-
तिनके लाने वाले साथी
इनकी पहुंच से बाहर हैं

दो
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चिडिय़ा प्यारी!
मेरे रोशनदान से अपने तिनके ले जा
ऐसा न हो कि
मेरे घर की बीरानी- कल
तेरे घर की आबादी को खा जाए
तुझ पर मेरी मांग का साया पड़ जाए!


तीन
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गौरैया!
क्यों रोती है?
आज तो तेरे घर में सूरज हवा का कासिद (डाकिया) बना हुआ था
किरने तेरे सब बच्चों की उंगली थामे रक्सां (नृत्यमग्न) थीं
नन्हे पहली बार हवा से गले मिले थे
और हवा से जो इक  बार गले मिल जाता है
वह घर वापस कब आता है?

चार
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सजे-सजाए घर की तन्हा चिडिय़ा!
तेरी तारा-सी आंखों की वीरानी में
पच्छुम जा बसने वाले शहजादों की मां का दुख है
तुझको देख के अपनी मां को देख रही हूं
सोच रही हूं
सारी मांएं एक मुकद्दर क्यों लाती हैं?
गोदें फूलों वाली
आँखें फिर भी खाली

2 comments:

  1. उम्दा रचना पढ़वाई आपने..आभार!

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