साथ-साथ

Friday, May 28, 2010

अशोक वाजपेयी की कविता

हिन्दी के सुपरिचित कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी की लगभग तीस बरस पुरानी यानी 1990 में लिखी यह कविता जीवन में जिन जरूरी चीजों को सहेजने की बात करती है, उससे भला कौन सहमत नहीं होगा? यहां जीवन को अपनी तरह से जीने और बरतने का भी मामला है। पढि.ए कविता-

:: एक बार जो ::
एक बार जो ढल जाएंगे
शायद ही फिर खिल पाएंगे।

फूल शब्द या प्रेम
पंख स्वप्न या याद
जीवन से जब छूट गए तो
फिर न वापस आएंगे।
अभी बचाने या सहेजने का अवसर है
अभी बैठकर साथ
गीत गाने का क्षण है।

अभी मृत्यु से दांव लगाकर
समय जीत जाने का क्षण है।

कुम्हलाने के बाद
झुलसकर ढह जाने के बाद
फिर बैठ पछताएंगे।

एक बार जो ढल जाएंगे
शायद ही फिर खिल पाएंगे।

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  2. hai...im testing cocoment....glad to know u..

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