साथ-साथ

Monday, January 4, 2010

ऐ लड़की

ऐ लड़की औरत बनो, करो मर्द से प्यार ।
झुकी हुई गर्दन रखो, वह भांजे तलवार ॥

चूल्हा - चक्की रात - दिन, टीका - बिंदी माथ ।
तू गुलाम उस पुरुष की पकड़ा जिसने हाथ ॥

नियम बनाए उसी ने वही करे गुणगान ।
वह तेरा स्वामी बना तू उसका सामान ॥

मर्द बने महिमा - पुरुष बांह तुम्हारी थाम ।
आत्म - समर्पण तुम करो हो जाओ बेनाम ॥

लक्ष्मी हुई कुलच्छनी, बेटी जाए तीन ।
भरी हिकारत हर नज़र, मिटे स्वप्न रंगीन ॥

कुलदीपक तो कुलवधू यह दुनिया की रीत ।
ऐ लड़की, बेमोल है व्याकुल मन की प्रीत ॥

7 comments:

  1. वाह! क्या दो टूक बात की है।
    नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
    घुघूती बासूती

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  2. आपका लेखन हम सभी को और सार्थकता प्रदान करेआपके और आपके परिवार के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !!

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  3. जबरदस्त!!

    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  4. acchi soch ko acche shbdon mein vyakt kiya hai aapne, badhaiyan!

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  5. बढ़िया रचना है\बधाई।

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  6. ek ladki ke jivan baare me aapne bilkul sahi baat likhi.

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