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Thursday, May 26, 2011

चले नहीं जाना बालम...

हिंदी के विशिष्ट कवि स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कभी बकरी नामक नाटक लिखा था, जिसके मंचन की एक वक्त में धूम थी। उन्होंने बहुत अच्छी प्रेम कविताएं भी लिखीं और कुछ गीत भी। पढि़ए, उनका यह प्रसिद्ध गीत-

सुहागिन का गीत/सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम।

ड्ïयोढ़ी पर पहले दीप जलाने दो मुझको
तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझको
मंदिर के घंटे, शंख और घडिय़ाल बजे
पूजा की सांझ संझौती गाने दो मुझको
उगने तो दो पहले उत्तर में ध्रुवतारा
पथ के पीपल पर कर आने दो उजियारा
पगडंडी पर जल-फूल-दीप धर आने दो
चरणामृत जाकर ठाकुर जी का लाने दो

यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी-सी चले नहीं जाना बालम।

बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इनसे मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी
रजनीगंधा से ज्वार सुरभि की आने दो
इस नीम-ओट से ऊपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रोशनी आने दो
कर लेने दो तुम मुझको बंद कपाट जरा
कमरे के दीपक को पहले सो जाने दो

यह ठंडी-ठंडी रात उनींदा-सा आलम
मैं नींद भरी-सी, चले नहीं जाना बालम।

चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो
घर की मैना को जरा प्रभाती गाने दो
खामोश धरा, आकाश दिशाएं सोयी हैं
तुम क्या जानो, क्या सोच रात भर रोयी हैं
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आंचल में हरसिंगार भर लेने दो
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा-पूरा प्रकाश हो लेने दो

यह डूबी-डूबी सांझ उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम।

1 comment:

  1. चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो
    घर की मैना को जरा प्रभाती गाने दो
    खामोश धरा, आकाश दिशाएं सोयी हैं
    तुम क्या जानो, क्या सोच रात भर रोयी हैं
    ..bahut badiya prastuti ke liye aabhar

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