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Friday, November 26, 2010

घर में मातम था खुशी का!

हैरान होने के बजाय कवि-कथाकार गंगाप्रसाद विमल के ताजा कविता संग्रह खबरें और अन्य कविताएं से ली गई यह कविता पढि.ए तो पता चलेगा कि किन घरों में खुशी का मातम हुआ  करता है। यथार्थ कैसे व्यंग्य में बदल जाता है, इसकी बानगी है यह कविता।

खबरें : तीन/गंगाप्रसाद विमल

मरे थे नेता जी
खबर थी अपूरणीय क्षति की
फिर भी जगह भरनी थी
खुश थे वे-
शवयात्रा में वे खुश-खुश चेहरे देखो
कल उनमें से एक
बैठेगा इसी कुर्सी पर
और हम उसके गले में डालेंगे माला

स्मृति सभा के भाषण
पिछली मृत्युओं जैसे ही थे विशेषण मुक्त
विशेषण वैसे ही रहते हैं सबके लिए
समान निरर्थक
केवल बदल जाती हैं संज्ञाएं
घर में मातम था खुशी का
किसी को मिलनी थी जायदाद
किसी को उम्मीद थी करूणा के बहाने
कुर्सी मिलने की
किसी को तमाम चैनलों में
अपनी तस्वीर देखकर खुशी थी
खबर मातम की भी
फैला देती है खुशी, एक और
नेता खुश था
उसका भी स्वार्थ था कुछ-कुछ छिपा हुआ
नेता के नाम से उसने
खुद को चमकाया चांदी के जूते से
नेता को कब्र में दफना-
दफना दी उसने पिछली संज्ञाएं
और नए विशेषणों से
आरूढ़ हो जाएगा
नई यात्राओं की दिशा में

खबर
दिशाओं तक फैला गई थी खोजते नई दिशा।

2 comments:

  1. गंगाप्रसाद विमल जी की रचना पढ़वाने के लिए आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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