साथ-साथ

Monday, December 14, 2009

फलसफा

फलसफा कब तक चलेगा

भूख भी औ नींद भी ।

इस मुहर्रम जिंदगी में

मौलवी क्या ईद भी !

गीत गाओ जिंदगी के

और कैसी शर्त है,

एक पिंजरा खूबसूरत

मुश्तकिल ताकीद भी ।

इससे बढ़कर आजतक

देखा नहीं अचरज कोई

ख़ुद तो वह बीमार है

पर बांटता ताबीज़ भी ।

4 comments:

  1. बहुत बेहतरीन!

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  2. अरविन्द जी की कविता की सार्थकता उसमे निहित समाजवाद से जुडी है ,आज जब समकालीन कविता भाषा और अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से भूलभुलैया बनती जा रही है ,अरविन्द जी की कवितायें पढ़कर सकून मिलता है |

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  3. अरविन्‍द जी हम तो 1982 से आपके फैन हैं। सूर्योदय हम चाहते नहीं अंधेरी रात से। आपके ये दोहे पहली बार अनौपचारिका में पढ़े थे। जनपद में आकर अच्‍छा लगा। शुभकामनाएं ।

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  4. आपके कवितायें पढ़कर सकून मिलता है

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