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Thursday, April 28, 2011

तुझमें भी एक बुढिय़ा है!

राही मासूम रजा ने छह वर्षों तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में अध्यापकी की थी, फिर 1967 में मुंबई जा बसे। उस दौरान लिखी कविताओं का संग्रह है- मैं फेरीवाला बेचूं यादें। इसी संग्रह से है यह बहुत प्यारी कविता-

चांद की बुढिय़ा/राही मासूम रजा

मां से एक बच्चे ने पूछा-
चांद में यह धब्बा कैसा है?
मां यह बोली-
चंदा बेटे, जिसको तुम धब्बा कहते हो
वह तो एक पागल बुढिय़ा है
बच्चे ने मासूम आंखों से
पलभर मां को देखा
तब यह पूछा-
मां, जब मैं चंदा बेटा हूं
तब तो मुझमें भी एक पागल बुढिय़ा होगी
मां ने उसको भींच लिया
उसके लब चूमे
गरदन चूमी
माथा चूमा
और ये बोली-
हां, तुझमें भी एक बुढिय़ा है!

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