साथ-साथ

Thursday, December 31, 2009

छप्पर की छाया तले

सुबह हो गयी दोपहर हुई दोपहर शाम ।

वह खटता है खेत में तू जपता है राम ॥

बैठ पेड़ की छाहँ में रोया बहुत किसान ।

सौ सपनों की कब्र है मालिक का खलिहान ॥

मालिक तेरे खेत में मेहनत अपनी बाँझ ।

सूर्योदय हम चाहते , नहीं अँधेरी सांझ ॥

कहाँ बजेंगी ढोलकें, कहाँ पड़ेगी थाप ।

हरियाली से दिल जले निकले कुँए से भाप ॥

सूना चौबारा पडा, सूनी है चौपाल ।

आब गया अब गाँव का आल्हा - ढोलक - ताल ॥

लूट मची है गाँव में घर - घर हाहाकार ।

तू बहरा - खामोश है तुझको सौ धिक्कार ॥

छप्पर की छाया तले कटते बारह मास ।

यह छाया ही जानती मौसम का इतिहास ॥

Tuesday, December 29, 2009

मौसम है मनमोहन जैसा

मौसम है मनमोहन जैसा

सबकुछ हो गया ग्लोबल - ग्लोबल, लोकल जैसा - तैसा ।

ख़बर रसीली बड़ी नशीली सैफ - करीना जैसी,

चैनल - चैनल मस्ती छाई, देखो गदह पचीसी ।

ठंडी जेब, तबीयत ठंडी, मन - मिजाज़ है ठंडा,

लोग पहेली बूझ रहे हैं पहले मुर्गी या अंडा ।

बड़े ठसक से बैंक गए थे सूरत हो गयी रोनी,

नकली नोट मिल गए भइया क्या होनी - अनहोनी ।

खेत बिक गए, भैंस बिक गयी, छुट्टा घूमे भैंसा

हम भी यहीं आप भी यहीं हुआ तमाशा ऐसा ॥

Sunday, December 20, 2009

जब आप खर्राटे भरते रहे

आप तो सीधी सड़क पर

गाडी दौडाना जानते हैं ।

मत पढ़िए कविता

पता नहीं कहाँ - कहाँ तक

घसीट ले जाएगी, भद्रजन !

खतरनाक चीज है यह

अपनी रफ़्तार में फ़ेंक सकती है

गाड़ी को पटरी के बाहर,

आप तो बस जमाए रहिये कारोबार

करते हुए

बंगला - गाड़ी - राजनीति

औरत और बच्चों का जाप

मगर मत पढ़िए कविता

जिंदगी में खलल पैदा करेगी, कमबख्त ।

मसलन, एक लड़की

अपनी अच्छी उम्र तक

खाती रही नौकरी की मार

नहीं कर पाई प्रेम

मसलन, एक आदमी

कारोबार की फ़िक्र के साथ

इस चौकीदारी पर तैनात रहा

की बच्चों को लगने न पाये कविता की छूत

रात भर कविता का भूत

सताता रहा उस लड़की को

जो नौकरी के बजाय नहीं कर पाई प्रेम

और करवट बदल कर सुबकती रही

उम्र गुजर जाने के बाद

रातभर इस बेगानी दुनिया में

जब आप खर्राटे भरते रहे !

Friday, December 18, 2009

शहर एक दुहस्वप्न

जब मैं नहीं था

कहाँ था शहर !

इस तरह तो नहीं था

मैं हूँ शहर में

और मेरे भीतर धंसा है शहर

मेरे जेहन में

मेरे लहू में

मेरी साँस में

कूट - कूटकर भर गया है

बाईं पटरी पर चप्पल घसीटता

चौराहे पर ठिठका

हडबडी में रास्ता पार करता

बेतहाशा दौड़ता - भागता - हांफता

पसीने से लथपथ

धक्के खाता शहर

जब मैं नहीं था

कहाँ था !

आमसभा में भकुआया

भाषण सुनता

मूगंफली टूंगता

तालियाँ पीटता

जुलूस में चिन्चियाता

दफ्तर में देर से पहुंचकर

अफसर की डाट खाता

सर झुकाए सारी सर बोलता

मिमियाता कहाँ था शहर

जब मैं नहीं था ...

जब मैं नहीं था

सड़क पर ऐसी ही रोशनी थी

और पार्क में ऐसा ही अन्धेरा ?

क्या पता !

सिनेमाघर में ऐसी ही फुसफुसाहट थी

बगल की कुर्सी पर - अंधेरे में ?

क्या पता !

जब मैं नहीं था शहर में

जेब भी कहाँ कटी थी इस तरह !

इतना तो मैं डरता नहीं था कभी

सच बोलने में

बेपरदा होने का डर कहाँ था

जब मैं नहीं था शहर में !

इतनी उमस नहीं थी

जब मैं नहीं था

मच्छरदानी के नीचे

इस तरह भागती नहीं थी नींद

जैसे भागती है मच्छरदानी से छन कर ।

दुह्स्वप्नों के पहाड़ का बोझ लिए

छाती की पसलियों को चरमराता

दबोचता है शहर -

एक राक्षस का पंजा कसता है गले पर

ऐसे तो हडबडाकर

बीच में नहीं टूटती थी नींद !

भोर के सपनों को

तेज धार वाली सीटी से चीरती

धडधडाती गुजर जाती है ट्रेन

इसी ने तो ला पटका था मुझे यहाँ

फिर कहाँ आती है नींद !

...........

शहर तो था ही

जब मैं नहीं था

कैसा था मगर

कोई नहीं जानता -

सब जानते हैं सिर्फ़ अपना -अपना शहर

शहर सबका कहाँ होता है -

अपने - अपने सपने की तरह

शहर का अपना - अपना बोझ होता है

शहर की अपनी - अपनी छाया ,

कौन भाग पाता है शहर से भला अपना पीछा छुडाकर

अपने सपनों का बोझ कौन उतार पाता है !

क्या आपके कंधे

मेरी ही तरह

दुखने लगे हैं ?

मेरे सपने यहीं दफन हैं

यही है मेरे सपनों की कब्रगाह

अभी-अभी टूटी है नींद

अभी-अभी उठा है मेरी छाती से

दुह्स्वप्नों के पहाड़ वाला भीमकाय राक्षस

यही मौका है

अंधेरे के बावजूद

दुबारा सवार हो

वह मेरी छाती पर

इससे पहले मुझे बिस्तर छोड़

उठ ही जाना होगा ,

मुझे खोद डालनी है

सपनों की यह कब्रगाह

यहीं दफन हो गए हैं सारे लोकगीत ।

यह कैसी आहट है अंधेरे में -

क्या और भी कुदालें चल रहीं हैं ?

मुझे खोदते ही चले जाना है

बेकार है इन्तजार

सुबह के होने का !

मौसम और सीजन

एक अपाहिज घसीटता चलता है शहर

समूचा दिन - सुबह-शाम - रोज-ब-रोज

पहाड़-सा ढोता है

महीना और साल,

बाघनख-सा उधेड़ देती है तारीख

उसकी दिनचर्या

आंखों के सामने

चिमनी का धुंधलका

छा जाता है ।

दर्द-सा उठती है ऊंची मीनार

वह गांठता है तार-तार

अपना अस्तित्व

मगर सुई से धागा

बार-बार निकल जाता है ।

तब भी कुछ लोग

पतंग-सा उड़ाते हैं

हाथों में डोर थामे,

वे बुनते हैं

स्वेटर-सा रंग-बिरंगा मौसम

उनके लिए

समय और आइसक्रीम

दोनों एक जैसे हैं ।

जिनके लिए

ठण्ड कारोबार है

बरसात है सीजन

और गरमी -

धुप में चिलचिलाते किसी नुक्कड़ पर

गुमटी के घड़े में भरे ठंडे पानी का धर्मादा

उनके लिए

मौसम की कविता

मुनाफे की चीज भला कैसे हो सकती है !

Thursday, December 17, 2009

अजब प्रेम की गजब कहानी

अजब प्रेम की गजब कहानी ।

लोकतंत्र का गला सूखता जनता पानी - पानी ॥

रामदास को हुई रतौंधी रहीम की गूंगी बानी,

गावं - गली में भूख बिराजै मिले न दाना - पानी ॥

ठेकेदारी धन सरकारी ले गए दिलवर जानी,

कुछ बैठे भोपाल - लखनऊ कुछ दिल्ली रजधानी ॥

ऐ के सैंतालिस, गाड़ी क्वालिस, आंखों में शैतानी,

डंडा - झंडा, हर हथकंडा, बोले मधुरी बानी ॥

आज माफिया कल को मंत्री यह भविष्य की बानी,

ना जाने किस भेष में आए, जो बूझे सो ग्यानी ॥

Wednesday, December 16, 2009

आज कोई कविता नहीं

आज कोई कविता नहीं । उसकी जगह उन सभी सम्मानित रचना धर्मियों - कर्मियों, कविता प्रेमियों - मर्मियों को मैं ह्रदय से कृतज्ञता व्यक्त करना चाह रहा हूँ जिन्होंने मेरी कवितायेँ पढ़ी और अपनी आत्मीय टिप्पणी से मेरा यह भरोसा मजबूत किया की तुमुल कोलाहल कलह के बीच भी बिना शोर किए आवाज़ में असर पैदा किया जा सकता है। उन सम्मानितों का नाम लूँ , इसके पहले एक छोटा प्रसंग - कोलकाता के जनसत्ता में जब सबको कंप्यूटर पर काम करना जरूरी किया जा रहा था, तब हमारे प्रधान सम्पादक प्रभाष जोशी ने मुझसे पूछा - कविता कठिन है या कंप्यूटर ? मेरा जवाब था - बेशक कविता कठिन है । हालांकि मुझे कंप्यूटर भी तब कठिन लग रहा था और आज भी बस कामचलाऊ मामला है।
दोस्तों, मैं यह मानता हूँ की कविता तभी तक लिखी जा सकती है , जबतक उसे पढने वाले हैं - ठीक वैसे ही जैसे गाये और सुने न जाएँ तो गीत कैसे लिखे जा सकते हैं ? यानी रचना लिखने और पढने-सराहने वाले की साझेदारी में ही सम्भव है । इसलिए मैं उड़न तश्तरी वाले समीर लाल, अफलातून, आवेश तिवारी, पंकज पराशर, राजेश उत्साही, शरद कोकास, डाक्टर राधेश्याम शुक्ल, मधुकर राजपूत, अजित वडनेरकर, परमजीत बाली, लोक्संघर्ष वाले सुमन जी, नीरज गोस्वामी, अनिल कान्त, वानीगीत, देवेन्द्र खरे, मनोज कुमार, अलका सारावत, अंशुमाली रस्तोगी, दिनेश दधीची, पीसी गोदियाल, प्रवाह वाले पंकज जी, अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, प्रवीण त्रिवेदी, शेष नारायण सिंह, निर्मला कपिला, रजनीश परिहार, भंगार, घुघूती बासूती, अलबेला खत्री, राजेय शा, एम् वर्मा, मिथिलेश दुबे, अजय कुमार, अरुण सी रॉय, अमित के सागर, मनोज कुमार सोनी, नारद मुनि, विजय कुमार कुशवाहा, अमलेश राय - को अपनी कविताओं का साझीदार मानकर आभार जताता हूँ । कुछ मित्र तो मेरे ब्लॉग के फालोवर ही बन गए हैं - सबका आभारी हूँ , उनका भी - जिन्होंने कविताएँ पढ़ी तो होंगी मगर अपनी राय नहीं दे सके ।
कल फिर कविता लेकर हाज़िर होऊंगा। नमस्ते दोस्तों !