साथ-साथ
Thursday, January 7, 2010
धूप के बारे में
चुप चुप
उतरती है धूप
कोहरे को फाड़ती है
गरमी
अँधेरे की धज्जियाँ
उड़ा देती है
रोशनी .
मेरे मन में आता है
मैं गाऊँ
धूप के लिए एक प्यार भरा गीत
अपने जी - जान से गाऊँ
की सारे जहां में
धूप की तरह फैलती
गीत की लय
इजहार कर दे
की धूप प्यार करने की चीज है .
दो
मैं देख रहा था -
सड़क पर
ऊंची इमारत के बाजू से
किसी तरह छलक कर
बमुश्किल उतरा
धूप का एक तिकोना टुकड़ा
इतने में
सिपाही का भारी - भरकम बूट
जो उस पर पड़ा
तो मैं सिहर गया भीतर तक
मुझे ठण्ड - सी लगी
मेरा शरीर काँप - सा गया .
Tuesday, January 5, 2010
करमा हुआ उदास
धांगर विन्ध्य क्षेत्र के आदिवासियों की एक जाति है - हो सकता है वे दूसरे इलाके में भी हों। जांगर का मतलब होता है मेहनत। करमा आदिवासियों का गीत -नृत्य है ।
धांगर का जांगर खटे, खटे पहाड़ - पहाड़ ।
इस जंगल - क़ानून में सौ - सौ खाय पछाड़ ॥
आज़ादी क्या चीज है कोई उसे बताय ।
जो जंगल से बेदखल जंगल को ललचाय ॥
वनवासी - गिरिजन हुआ ठीकेदार का शूल ।
इसे प्यार से देख तू यह महुआ का फूल ॥
वनवासी की जिंदगी या की झाड़-झंखाड़ ।
जैसी सूखी लकड़ियाँ उसके तन के हाड़॥
एक फैक्टरी खुल गयी जिस जंगल के पास ।
वनवासी ढहकर गिरा करमा हुआ उदास ॥
तू पहाड़ पर खड़ा है सूरज तेरे पास ।
तेरे घर अंधेर क्यों , क्यों तू बहुत उदास ॥
जंगल - जंगल तुम चले , चले नदी के तीर ।
तेरे घर में चोर है ऐ पर्वत के वीर ॥
तू इतना चुपचाप है जैसे एक एक पहाड़ ।
मौसम की दहशत बड़ी या तेरी चिग्घाड़ ॥
Monday, January 4, 2010
ऐ लड़की
झुकी हुई गर्दन रखो, वह भांजे तलवार ॥
चूल्हा - चक्की रात - दिन, टीका - बिंदी माथ ।
तू गुलाम उस पुरुष की पकड़ा जिसने हाथ ॥
नियम बनाए उसी ने वही करे गुणगान ।
वह तेरा स्वामी बना तू उसका सामान ॥
मर्द बने महिमा - पुरुष बांह तुम्हारी थाम ।
आत्म - समर्पण तुम करो हो जाओ बेनाम ॥
लक्ष्मी हुई कुलच्छनी, बेटी जाए तीन ।
भरी हिकारत हर नज़र, मिटे स्वप्न रंगीन ॥
कुलदीपक तो कुलवधू यह दुनिया की रीत ।
ऐ लड़की, बेमोल है व्याकुल मन की प्रीत ॥
Sunday, January 3, 2010
कितने गरीब लोग हैं !
तीन दिसंबर की खबर है की यूपी में ठण्ड से एक दिन में ३० लोगों की जान गयी ।
कुछ दिनों पहले ही एक उड़िया अखबार के हवाले से खबर मिली की एक गरीब औरत ने
एक बच्चे को बेच कर अपने दुसरे बच्चे के लिए गरम कपडे और खाना बनाने के लिए कुछ बर्तन खरीदे ।
कितने गरीब लोग हैं इस ठण्ड में दम तोड़ देते हैं,
खूब हैं सरकार, उनको किसके भरोसे छोड़ देते हैं !
देखिये, वो आपका कैसे मुखौटा नोच देते हैं,
एक बच्चा बेचकर दूजे को कम्बल-कोट देते हैं ।
सियासत गर्म है उस्ताद को मिल जायं सूबेदारियाँ
इस तरह असली सवालों का गला वो घोट देते हैं ।
अजी, कुछ सोचिये वो भी अभागे आप ही को वोट देते हैं,
क्या गजब है रहनुमाई आप उनको चोट देते हैं ।
Saturday, January 2, 2010
सौ - सौ खाय फरेब
यह शहराती जिन्दगी चकाचौंध की धाक ।
पढ़ा - लिखा मैं गाँव का अपने घर की नाक ॥
इस सरहद पर शहर है उस सरहद पर गाँव ।
हुआ अपाहिज आदमी खड़े - खड़े इक पाँव ॥
मेहनत और मशीन का ऐसा विकट हिसाब ।
तू मजूर भूखों मरे, पैसा गिने नकाब ॥
औरत अगर गरीब है, है बदचलन जरूर ।
मुखिया इज्जतदार है कह गयी पुलिस हुजूर ॥
बूढा बरगद गाँव में ज्यों सबको दे छाँह ।
मुखिया ऐसा चाहिए थामे सबकी बांह ॥
जली हुई बीडी बुझी खाली - खाली जेब ।
अच्छा - खासा आदमी सौ - सौ खाय फरेब ॥
Friday, January 1, 2010
मुबारक नया साल !
नया साल
जैसा भी है - फटेहाल
जश्न को करता भग्न
क्रीडा और करुणा में मग्न
मुबारक हो !
बीत गई सो बात कहाँ जाती है
बीते दुःख की आहट भी आती है
फिर भी
नया साल है
मिलजुल कर हल करें
सामने जो सवाल हैं ।
झारखंड में जाड़ा
सुबह आँख मलती हुई, लिए कंपकंपी शाम ।
मन में गरमी भर सके जपो धुप का नाम॥
पाला पड़ता फसल पर दिल में जले अलाव ।
इस हरजाई ठण्ड को गाली देता गाँव ॥
पांवों में चुभने लगी सुबह - सुबह की दूब।
माली निकला बाग़ की हरियाली से ऊब ॥
बिस्तर में गठरी बनो डाले पेट में पाँव ।
सारे घर को ठण्ड ने बना लिया है ठांव ॥
बरगद कहे अधीर हो बर्फानी मत छेड़ ।
कुछ तो शर्म - लिहाज़ कर, अब मैं हुआ अधेड़ ॥
ठंडक बढती ही गयी कोहरे का फैलाव ।
लोग इकट्ठा हो गए जलते गए अलाव ॥
खांसी की ठकठक हुई जगी चिलम की आग ।
दिल से एक धुंआ उठा या पीड़ा का राग ॥