साथ-साथ

Saturday, November 14, 2009

मुझे उड़ा दो

हवा में, धूल में

तूफ़ान - झंझावात में

मिट्टी में मिला दो

घोल दो पानी में

कम -अज -कम

आदमी जब साँस लेगा

उसमे मैं रहूँगा ।

रोष में, क्षोभ में

गुस्सा -विद्रोह में

रहेगी मेरी छाया ।

प्यासे की अंजुरी में

एक घूँट पानी बनकर

उसके गले के नीचे उतर जाऊंगा

मिट्टी में भी रहूँगा

तो फसल की पत्तियों और फलियों में

बना लूंगा अपनी गुंजाइश

अन्न बन जाना

बेहतर होगा मेरे लिए

कांपते पत्ते पर ठहरी बूँद की तरह

मुझे रहने दो शब्दों की खामोशी में

मैं बार -बार लौटूंगा

भरोसे के लिए भाषा में

यही है मेरा स्थाई पता ।

लिखना चाहता हूँ

मैं जीना चाहता हूँ प्यार से

लिखना चाहता हूँ

एक कविता विस्तार से

पोछ देना चाहता हूँ पसरी हुई सारी उदासी

ह्रदय के पठार से ।

चारों तरफ़ घिरे हुए इस बाड़े में

मैं कब से घूम रहा हूँ

डूब रहा हूँ एक दुर्गन्ध में

इस घेरे को तोड़ देना चाहता हूँ मुकम्मल इनकार से ।

अखाडा -धर्म की धूल में मुझे नहीं लिपटना

भुस के पुतलों को पटखनी देकर

अपने गले में मुझे माला नहीं डालना

वे जाते हैं

अयोध्या -काशी , काबा -मक्का

तो जाएँ

मक्का जाने के बजाय

मैं मक्के की खेती करूंगा

मुझे कुछ नहीं लेना उनकी ललकार से

मुकाबला करूंगा उनका भूख की चीत्कार से ।

आपको जाना है तो जाइए

बुश या लादेन या सद्दाम के साथ

मैं जा रहा हूँ

अपने पड़ोसी हज्जाम के साथ ।

मैं जीना चाहता हूँ प्यार से

लिखना चाहता हूँ एक कविता विस्तार से ...

नहीं मिला सकता हाथ

एक साधारण आदमी की तरह

मैं लिपटा रहा भूख से - बेगारी से

मेहनत - महामारी से

बेशर्म की तरह , आदत से लाचार

अब भी मैं करता हूँ प्यार

किसी नारी से

घृणा व्यभिचारी से

मैं नहीं मिला सकता हाथ किसी व्यापारी से ।

जानता हूँ

सफलता के लिए घातक हैं ये आदिम आचार

मेरे हिस्से आती है हार

इसी लिए बार -बार

फ़िर भी मैं जगता हूँ , सूतता हूँ

और उनकी जीत पर मूतता हूँ ।

Thursday, November 12, 2009

आख़िरी उम्मीद

हत्यारे लाख कोशिश करें
मगर दुनिया के
रसातल में पहुँच जाने के बावजूद
मसान की मिट्टी से गर्दन उठा कर
खिलखिला पडेगा कोई फूल
कब्र के अंधेरे को फाड़कर
चंद हरी पत्तियों के साथ
निकल ही आएगी
एक जिद्दी टहनी

हत्यारे लाख कोशिश करें ।

जैसे मृत्यु के पहले
आदमी सौंप जाता है
अपनी भाषा किसी और को
तमाम दुर्घटनाओं में
दब -कुचल कर भी
मेरी आख़िरी उम्मीद
जीवन के अगल -बगल खडी रहेगी -
मौत को दुत्कारती -धिक्कारती

कविता नहीं बिछेगी
हत्यारों के पाँव के नीचे
कालीन बनकर
शब्दों से नहीं छीने जा सकेंगे
उनके अर्थ

हत्यारे लाख कोशिश करें ।

Tuesday, November 10, 2009

मेरा शहर

जब मैं कविता लिख रहा था
कुछ लोग हडबडी में थे
दफ्तर पहुँचने की
कुछ को कारोबार की फ़िक्र सताए थी
कुछ ऐसे थे
जो भागे जा रहे थे
सड़क पर एक -दूसरे को धकियाते
राजधानी की ओर।

यहाँ तक की मेरा पड़ोसी
सुबह घर से गायब होता था
और एक आला अफसर के आगे -पीछे
दिन भर घूमते हुए ठेकेदार बन बैठा

जब कविता पूरी हुई
तब तक कुछ लोग बड़े इत्मीनान के साथ
दुनिया को जहन्नुम में भेजते हुए
अपने -अपने दफ्तर में प्रमोशन पा चुके थे
कारोबार की फ़िक्र
मुनाफे की ठसक में तब्दील हो चुकी थी
जो भागे जा रहे थे
सड़क पर एक -दूसरे को धकियाते
संसद के स्वर्ग में विराजने लगे थे
पड़ोसी से ठेकेदार हुए आदमी के प्रताप से
एक स्कूल की छत पहली ही बरसात में
यूँ भहराई की दब मरे बीस बच्चे
भरी जवानी में
सड़क के गड्ढे में पाँव तुडा कर
एक आदमी ने पकड़ ली चारपाई

नगर पिता का कमाल लाजवाब साबित हुआ -
वह जितनी दवाएं बंटवाता
बीमारों की तादाद
उतनी ही बढ़ जाती हर साल

शहर में जितनी ऊंची उठती जाती है दीवार
उतने ही ज्यादा उस पर चस्पा होते जाते इश्तहार ।

Monday, November 9, 2009

जो होते हैं महज दर्शक

महज जिंदगी के सवाल नहीं होते
वरना विज्ञापित दुनिया में क्या कुछ नहीं होता
सुंदर सजा -धजा घर होता है
घर में सोफा -टीवी -फ्रीज
संचित लोभ और झूठ से ठसाठस भरी अलमारी
चाभी भरे खिलोनों से खेलते
खिलखिलाते बच्चे
खाने की मेज़ पर तरह -तरह के व्यंजन परोसती एक सुंदर नारी
विज्ञापित जिंदगी में क्या कुछ नहीं होता
स्वाद में सदाशयता , सम्बन्ध में मक्कारी
बैठकखाने की दीवार पर टंगा होता है
एक अदद मुखौटा भी खामोश
जिसका किसी चीज में कोई हस्तक्षेप नहीं होता
जो होते हैं महज दर्शक
उनके लिए जिंदगी के सवाल नहीं होते

विज्ञापित दुनिया में बीमारियां नहीं होतीं
न उखड़ती है साँस
न आता है एक सौ चार डिग्री बुखार
लू नहीं चलती
ठण्ड से अकड़ कर कोई नहीं मरता
विज्ञापित दुनिया में अगर जुकाम होता है
तो छींक के साथ
कोई न कोई मरहम भी जरूर होता है
पहुंचाने के लिए राहत
जो दर्शकों को सुकून देता है
वे नहीं होते आहत ।

दर्शकों , आपके मद्देनज़र
खेद है की मेरे पास इस वक्त
राष्ट्र के नाम कोई संदेश नहीं है ।

Sunday, November 8, 2009

चित न धरो

हे इश्वर मैंने तुम्हे अपना एजेंट नहीं बनाया
और इस तरह
अपनी कूबत भर
तुम्हारा बोझ हल्का किया - तुमको नहीं सताया .

मैंने प्रार्थना के गीत नहीं गाये
न गिरगिराया तुम्हारे आगे
पहले से ही लम्बी कतार में खड़े थे अभागे
मैंने तरस खाई
थोड़ी सब्र से काम लिया
और तुम्हे छोड़ दिया
हरदम झींकते रहने वाले अधीर लोभी अपाहिजों के लिए
कम से कम मेरी तरफ़ से निश्चिंत होकर
तुम उन्हें संभाल सको
ठीक से उबाल सको उनके आलू .

जिनको अपनी जिंदगी पर आती है मितली
वैसे लोगों में मैं नहीं हूँ
वे सुनायेंगे तुमको अपनी हाय हाय
पूछेंगे तुम्हीं से उपाय
क्यों उन्हें आती है मितली .

अपने किए और जिए पर
मैंने न तुमको पुकारा
न ख़ुद को धिक्कारा
सोया फ़िर से जागने के लिए
मैंने यह जिंदगी नहीं पायी है
महज भागने के लिए
तुम्हारे पीछे .

तुम्हें चौकीदार तैनात कर पडा रहूँ आँखें मीचे
मैं ऐसा खुदगर्ज नहीं हूँ
मेरी तरफ़ से तुम्हारी छुट्टी
जाओ थोड़ी मौज करो
मेरो अवगुण चित न धरो .